सोना और चांदी हुआ ‘रॉकेट’ क्या अब शादियों में सिर्फ यादें ही सजेंगी ?
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यह एक बहुत ही संवेदनशील और सामयिक विषय है । भारत में सोना और चांदी केवल धातु नहीं , बल्कि भावनाएं , परंपराएं और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक हैं । यहाँ एक विस्तृत और भावनात्मक ब्लॉग दिया गया है जो मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष और बदलती परिस्थितियों को दर्शाता है ।
भारतीय संस्कृति में ‘शादी’ सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं , बल्कि दो परिवारों के सपनों का संगम है । इन सपनों की चमक हमेशा से सोने और चांदी से मापी जाती रही है । लेकिन आज के दौर में , जब सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं और चांदी ‘रॉकेट’ बन गई है , हर मध्यमवर्गीय परिवार के मन में एक ही सवाल है— “अब बिटिया की विदाई कैसे होगी ?”
1.परंपरा की चमक या कीमतों का अंधेरा ?
पुराने समय में , जब घर में बेटी का जन्म होता था , तभी से मां-बाप अपनी छोटी-छोटी बचतों से सोने का एक-एक दाना जोड़ना शुरू कर देते थे । वह ‘तिजोरी’ सिर्फ गहनों के लिए नहीं थी , बल्कि पिता के उस भरोसे की थी कि वह अपनी लाडली को खाली हाथ विदा नहीं करेगा ।
आज जब सोना 15000000 /- रुपये और चांदी 300000/- रुपये प्रति किलो के पार जाने की होड़ में हैं , तो वह तिजोरी अब अधूरी लग रही है । एक पिता जो अपनी पूरी जिंदगी की कमाई बेटी की शादी में लगा देता है , आज वह ज्वैलरी शॉप के बाहर खड़ा होकर कीमतों के बोर्ड को देखकर ठंडी आह भरता है ।
2.वह मध्यमवर्गीय मां की दुविधा
एक मां ने सालों पहले अपनी पुरानी चूड़ियां बचाकर रखी थीं ताकि उन्हें तुड़वाकर अपनी बहू के लिए नया सेट बनवा सके । लेकिन आज जब वह सुनार के पास जाती है , तो उसे पता चलता है कि मेकिंग चार्ज और बढ़ी हुई कीमतें उसकी उम्मीदों पर पानी फेर रही हैं ।
क्या अब सिर्फ ‘दिखावा’ होगा ? लोग अब भारी सोने के बजाय ‘लाइटवेट’ ज्वैलरी की ओर भाग रहे हैं ।
भावनात्मक चोट एक मां चाहती है कि उसकी बेटी ससुराल में ‘शान’ से जाए , लेकिन कीमतें उसे ‘समझौते’ पर मजबूर कर रही हैं ।
3.शादियों का बदला स्वरूप दिखावा बनाम मजबूरी
शादियों के सीजन में अब वह उत्साह कम और तनाव ज्यादा दिखने लगा है । चांदी के जो सिक्के शगुन के तौर पर बांटे जाते थे , अब उनकी जगह स्टील या पीतल के बर्तनों ने ले ली है ।
“कल तक जो चांदी हमारी थाली की शोभा थी , आज वह तिजोरी के किसी कोने में कैद होकर रह गई है ।”
मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अब सोना खरीदना किसी ‘जंग’ जीतने जैसा हो गया है । लोग अब शादियों के लिए बैंक से लोन ले रहे हैं , जमीनें बेच रहे हैं , सिर्फ इसलिए ताकि समाज में उनकी नाक बची रहे और परंपरा का निर्वहन हो सके ।
4.क्या ‘आर्टिफिशियल’ ही भविष्य है ?
बाजारों में अब ‘इमिटेशन ज्वैलरी’ का बोलबाला है । शादियों की तस्वीरों में जो चमक दिखती है , वह अक्सर असली सोने की नहीं होती । यह एक कड़वा सच है कि अब लोग गहने पहनते तो हैं , पर उनके खोने का डर नहीं होता , क्योंकि वे असली नहीं होते । लेकिन क्या एक पिता का मन मानता है ? बिल्कुल नहीं ।
भावनात्मक पहलू -पिता के लिए सोने का हार सिर्फ एक गहना नहीं , उसकी मेहनत का पसीना है । जब वह उसे अपनी बेटी के गले में डालता है , तो उसे लगता है कि उसने अपनी बेटी को सुरक्षित कर दिया ।
5.कीमतों की इस दौड़ में क्या खो रहा है ?
A सुकून – शादियां खुशियों का उत्सव होनी चाहिए थीं , लेकिन अब यह ‘बजट’ का गणित बन गई हैं ।
B विश्वास –आने वाली पीढ़ी अब सोने को एक निवेश तो मानती है , लेकिन परंपरा से इसका नाता टूट रहा है ।
C चेहरे की मुस्कान – एक आम आदमी के लिए ‘रॉकेट’ बनता सोना उसकी रातों की नींद उड़ा रहा है ।
6.निष्कर्ष क्या रास्ता निकलेगा ? हमें समझना होगा कि सोना और चांदी की चमक से कहीं अधिक कीमती हमारे रिश्ते हैं । अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं , तो शायद हमें अपनी शादियों के रीति-रिवाजों को फिर से परिभाषित करना होगा ।
सादगी अपनाएं गहनों से ज्यादा महत्व बेटी की शिक्षा और उसके स्वावलंबन को दें ।
दिखावे से बचें समाज क्या कहेगा , इस डर से कर्ज न लें ।
अंत में बस इतना ही... सोना महंगा हो सकता है , चांदी रॉकेट हो सकती है , लेकिन एक पिता का अपनी बेटी के प्रति प्रेम और आशीर्वाद हमेशा ‘अमूल्य’ रहेगा । वक्त बदल रहा है , कीमतें बदल रही हैं , लेकिन उम्मीद है कि खुशियों की चमक कभी कम नहीं होगी ।
आपके विचार क्या हैं ? क्या आपको भी लगता है कि सोने-चांदी की कीमतों ने शादियों का मजा किरकिरा कर दिया है ? कमेंट में अपनी राय जरूर साझा करें ।
पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏🙏🙏
